Vigyan Bhairav Tantra PDF Book in Hindi – संपूर्ण विज्ञान भैरव तंत्र हिंदी
मुझे
यह देखकर हार्दिक प्रसन्नता है कि डा०
बापूलाल आञ्जना ने त्रिक दर्शन
के प्रख्यात आगम ग्रन्थ ‘विज्ञानभैरव’
का हिन्दी में अनुवाद, व्याख्या
और भूमिका के साथ नवीन
संस्करण प्रस्तुत कर दार्शनिक जगत्
का बहुत उपकार किया
है। शिवोपाध्याय की संस्कृत टीका
( विवृति ) निश्चित ही परम्पराप्राप्त शास्त्रीय
अर्थ को समझने में
सहायक होगी। वस्तुतः विज्ञानभैरव आगम-सम्मत योग-परम्परा का अद्वितीय एवं
अनुपम ग्रन्थ है।
Vigyan Bhairav Tantra PDF Book
|
Name
of Book |
Vigyan
Bhairav Tantra |
|
PDF
Size |
32.4
MB |
|
No
of Pages |
213 |
|
Language |
Hindi |
About Book – Vigyan Bhairav Tantra PDF Book
इसमें
अभि- व्यक्त योगदृष्टि तथा धारणा बौद्ध
एवं पातञ्जलयोग-साधना से भिन्न है
। सत्य यह है
कि श्रुति परम्परा से भिन्न आगम-परम्परा का ही मज्जुल
प्रसून योगसाधना है। समाधि में
स्थित पशुपति की मोहंजोदाड़ो में
उपलब्धमूर्ति और योग-मोक्ष
की समन्वयशालिनी आगमीय योग-परम्परा इसका
पर्याप्त प्रमाण है । अष्टाङ्गयोग
की अपेक्षा षडंगयोग का विवेचन शारीरिक
अभ्यास की अपेक्षा मानस
योग को अधिक महत्वपूर्ण
बनाता है।
यह अत्यन्त व्यावहारिक एवं विधिरूप योग-प्रक्रिया है। आयोग भावातिरेक
की स्थितियों को यौगिक धारणाओं
में सम्मिलित कर विज्ञान भैरव
ने आज की विभीषिका
से समस्त मनुष्य के लिए मानों
नवीन द्वार खोला है। उद्वेलन,
उद्वेग की प्रत्येक दशा
को, कि वा जीवन
जीने के प्रत्येक सम
विषय और द्वन्द्वात्मक स्थिति
को समाधि की ओर ले
जाने की अत्यन्त व्यावहारिक
साधना का विज्ञान हमें
इस महत्त्वपूर्ण आगम ग्रन्थ में
उपलब्ध होता है।
आगम-निर्दिष्ट इन सभी साधना
पद्धतियों और धारणाओं का
साङ्गोपाङ्ग विवेचन और उसका प्रसन्न
शैली में निरूपण इस
संस्करण की विशेषता है।
मुझे विश्वास है कि इस
ग्रन्थ के प्रचार-प्रसार
से शैव-योग की
लुप्तप्राय साधना-पद्धति की पुनः प्रतिष्ठा
होगी और इसका श्रेय
इस ग्रन्थ के सम्पादक एवं
व्याख्याकार को प्राप्त होगा
। संस्कृत वाङ्मय के अध्ययन के
प्रति प्रारम्भ से ही मेरी
रुचि रही है।
एम०
ए० परीक्षा के लिए अध्ययन
करते समय साहित्य के
अतिरिक्त दर्शन ग्रन्थों के अध्ययन की
लालसा भी मन में
जगी। श्रद्धेय पूज्य गुरुवर दा रामचन्द्र द्विवेदी
की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन के
फलस्वरूप मैंने दीव-दर्शन के
विज्ञानभैरव नामक आगम ग्रन्थ
पर कार्य करने का निश्चय
किया। यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण
होते हुए भी अभी
तक हिन्दी अनुवाद से वंचित था।
यद्यपि प्रस्तुत ग्रन्थ की उपलब्ध टीकाओं
का उपयोग करते हुए तुलनात्मक
अध्ययन द्वारा इस पर विशद
ग्रन्थ लिखा जा सकता
है।
किन्तु
मैंने अपने ज्ञान की
सीमाओं और समय की
परिधि के कारण इसके
सटिप्पण अनुवाद के कार्य को
ही करना उचित समझा
है। अतः प्रस्तुत ग्रन्थ
में विज्ञान भैरव तथा उसकी
टीकाओं का हिन्दी में
अनुवाद प्रस्तुत किया गया है,
जो मेरा इस क्षेत्र
में प्रथम प्रयास है। दर्शन के अध्येताओं ने
‘विज्ञान-भैरव’ में प्रतिपाद्य विषय
के आधार पर इसे
‘काश्मीर के अन्तर्गत माना
है काश्मीरी-दर्शन के उद्भव एवं
विकास के सम्बन्ध में
यहाँ कुछ नहीं कहना
है। विद्वानों ने इस सम्बन्ध
में विशद प्रकाश डाला
है।
विज्ञान
भैरव का उल्लेख अभिनवगुप्त
ने अन्य तन्त्र-ग्रन्थों
के साथ किया है
तथा इसमें प्रतिपादित विषय तन्त्र-साधना
से सम्बन्धित है । अतः
इसे तांत्रिक मतका आधार ग्रन्थ
कह सकते हैं ।
तांत्रिक शैवमत को समझने तथा
अन्य तांत्रिक साधनाओं का तुलनात्मक अध्ययन
करने में विज्ञान भैरव
की विषयवस्तु विशेष महत्व की है। काश्मीरशैवदर्शन
के आधारभूत उपलब्ध साहित्य को तीन भागों
में विभाजित किया गया है-
(१) आगमशास्त्र, ( २ ) स्पन्दशास्त्र और
( ३ ) प्रत्यभिज्ञाशास्त्र ।
इनमें
आगमशास्त्र का प्रमुख स्थान
है। काश्मीरव आगमों में मालिनीविजयोत्तरतन्त्र, स्वच्छन्दतन्त्र और
आनन्दभैरव आदि प्रमुख आगमों
के साथ विज्ञानभैरव की
गणना की गई है।
विज्ञान भैरव की अवतारणा
देवी और भैरव के
संवाद रूप में हुई
है। यह रुद्रयामलतन्त्र का
सार है और इसे
सर्वशक्ति प्रभेदों का हृदय कहा
गया है- रुद्रयामलतन्त्रस्य सारमयावधारितम् । सर्वशक्तिप्रभेदानां हृदयं ज्ञातमद्य
च ।। १६२ ।।
यद्यपि
विज्ञान भैरव के कर्त्ता
का नामोल्लेख न मूल ग्रन्थ
में है और न
ही इसके टीकाकारों ने
उनके सम्बन्ध में कोई सूचना
दी है। अतः इसे
‘शिव’ प्रणीत ही माना जाता
है, क्योंकि स्वयं भगवान् शिव आगमों के
खष्टा एवं वक्ता कहे
जाते हैं- ‘स्वयं परमेश्वरः सिद्धान्तोपदिष्टा’ – वि० भै० का०
७ । भगवान् शिव
ने लोकानुग्रह के लिए ऋषियों
को ज्ञान प्रदान किया था और
तदनन्तर शिष्य-प्रशिष्यपरम्परा से आगमों का
ज्ञान जगत् में प्रचलित
होता रहा ।
इस कथन के अनुसार
प्रस्तुत विज्ञानभैरव के रचयिता के
रूप में भगवान् शिव
को ही स्वीकार किया
जा सकता है। ज्ञानभैरव
की जो दो टीकाएँ
उपलब्ध है, उनमें १६१
अथवा १६३ ( कारिकाओं ) छन्दों का मूल ग्रन्थ
स्वीकार किया गया है।
इस तन्त्रग्रन्थ में काश्मीराम के
ज्ञान और योग- पक्षों
का विवेचन है ग्रन्थ का
प्रारम्भ देवी के परमतत्व
के सम्बन्ध में प्रश्नों से
होता है, जिनका भैरव
ने क्रमशः समाधान किया है।
सम्पूर्ण
ग्रन्थ में परमतत्त्व के
स्वरूप निरूपण के बाद उसको
प्राप्त करने के उपायों
के रूप में ११२
धारणाओं का विवेचन किया
गया है, यद्यपि धारणाओं
की संख्या कुछ अधिक प्रतीत
होती है। ये धारणाएँ
परा और अपरा के
भेद से दो प्रकार
की है, जिनमें भरितावस्था,
मिरीधारणा, ध्येयाकार भावना, निरालम्बनभावना, दृष्टिबन्धनभावना आदि धारणाएँ प्रमुख
हैं।
ग्रन्थ
के अन्त में शिष्य
की पात्रता एवं अपात्रता का
उल्लेख किया गया है
तथा शिव के द्वारा
उपदिष्ट इस ज्ञान को
प्राणों से भी अधिक
महत्त्व- पूर्ण कहा गया है
‘प्राणाऽपि प्रदातव्या न देयं परमामृतम्
प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रतिपादित विषय
को स्पष्ट रूप से संक्षेप
में जानने के लिए आगे
दी हुई विषय सूची
है। विज्ञानभैरव पर अभी तक
कुल दो टीकाएँ ही
प्राप्त हुई है –
( १
) आचार्य प्रेमराज की उद्योत एवं
विषोपाध्याय की विवृति और
( २ ) भट्ट आनन्द की
विज्ञानकौमुदी दीपिका मूल ग्रन्थ पर
क्षेमराज की २४६ कारिका
‘ऊ प्राणी हाम्रो जीवो’ तक विज्ञानोद्योत नामक
विकृति प्राप्त होती है। ऐसा
शिवोपाध्याय ने ग्रन्थ के
अन्त में संकेत किया
है। यथा-
इन कृतियों को देखते हुए
यह कहा जा सकता
है कि यद्यपि वे
टीकाकार थे, किन्तु उनकी
टीकाओं का स्वतन्त्र ग्रन्थों
जैसा महत्व है।
क्षेमराज
ने विज्ञानभैरव पर जो विवृत्ति
लिखी है, वह २४
छन्दों तक ही प्राप्त
होती है। यह कहना
कठिन है कि ग्रन्थ
के शेष भाग पर
उन्होंने वृत्ति क्यों नहीं लिखी ? अथवा
यदि उन्होंने वृत्ति लिखी थी तो
वह अभी तक प्राप्त
नहीं हुई है। इस
पर गम्भीरता से विचार करने
पर क्षेमराज के समय पर
भी प्रकाश पड़ सकता है।
सम्भव है कि जीवन
के अन्तिम समय में उन्होंने
विज्ञान भैरव पर वृत्ति
लिखना प्रारम्भ किया हो, जिसे
जीवनान्त के कारण पूरा
नहीं कर पाए हों।
इस पर विशेष विचार-विमर्श की आवश्यकता है।
शिवोपाध्याय विज्ञान भैरव की २५वीं
कारिका से १६३ कारिकाओं
पर शिव उपाध्याय की
‘विवृति’ टीका प्राप्त होती
है। इन्होंने क्षेमराज के अधूरे कार्य
को पूरा किया है।
शिवोपाध्याय क्षेमराज की तरह ही
दार्शनिक विद्वान् थे । इन्होंने
अपनी विवृति के अन्त में
जो श्लोक दिया है, उससे
ज्ञात होता है कि
काश्मीर के राज्यपाल ‘जीवन’
के समय में इन्होंने
विज्ञान भैरव पर वृत्ति
लिखी थी। यथा- ‘सुखजीवनाभिधाने
रक्षति काश्मीरमण्डलं नृपतौ । अगमन्निःशेषत्वं विज्ञानोद्योतसङ्ग्रहः
सुगमः ॥
सुखजीवन
का समय १७५४ ई०
से १७६२ ई० तक
माना जाता है,” अतः
शिवोपाध्याय का भी यही
समय मानना चाहिए। विज्ञानभैरव की विवृति से
ज्ञात होता है कि
शिवोपाध्याय का वास्तविक नाम
शिव था और उपाध्याय
उनकी जाति थी ये
गोविन्द गुरु तथा सुन्दरकण्ठ
के शिष्य थे। इनका विज्ञान
भैरव विवृति के अतिरिक्त कोई
दूसरा ग्रन्थ प्राप्त नहीं होता, किन्तु
यह विवृति ही उनके पाण्डित्य
की परिचायिका है।
भट्ट
आनन्द ने सम्पूर्ण विज्ञान
भैरव पर स्वतन्त्र रूप
से दीपिका लिखी है। इनकी
दीपिका क्षेमराज की वृत्ति से
संक्षिप्त है। किन्तु उसमें
कई नये तथ्य भी
दिये गये हैं, जिनका
स्पष्टीकरण उक्त विवृति में
नहीं हुआ था। भट्ट
आनन्द के समय आदि
के विषय में निश्चयपूर्वक
कुछ भी कह पाना
कठिन है। इन्होंने विज्ञान- भैरव पर दीपिका
प्रारम्भ करने से पूर्व
मंगलाचरण में कुछ प्रसिद्ध
काश्मीर के दार्शनिक आचार्यों
को स्मरण किया है।
जिनमें
सोमानन्द, भूतराज, उत्पल, लक्ष्मणगुप्त और अभिनवगुप्त का
क्रम प्राप्त होता है। आचर्य
की बात है कि
भट्ट आनन्द ने क्षेमराज को
स्मरण नहीं किया है।
इससे इस निष्कर्ष पर
पहुँचा जा सकता है
कि अभिनवगुप्त ( ९५० ई० ) और
क्षेमराज (१०५० ई० ) के
समय के बीच में
भट्ट आनन्द किसी समय में
हुए होंगे। इसीलिए वे क्षेमराज का
उल्लेख नहीं कर सके
हैं; और क्षेमराज आनन्दभट्ट
का उल्लेख इसलिए नहीं कर सके,
क्योंकि वे अपनी वृत्ति
हो पूरी नहीं लिख
पाए थे।
जिससे
कि ग्रन्थान्त में उनका स्मरण
करते। सम्भवतः शिव उपाध्याय को
विज्ञान भैरव पर वृत्ति
लिखते समय भट्ट आनन्द
की दीपिका प्राप्त नहीं हुई होगी,
इसीलिए उन्होंने भी भट्ट आनन्द
का नामोल्लेख नहीं किया। इस
प्रकार यह कहा जा
सकता है कि विज्ञान
भैरव पर प्रथम दीपिका
भट्ट आनन्द ने लिखी, तदुपरान्त
क्षेमराज ने लिखना प्रारम्भ
किया, जिसे छह शताब्दी
बाद शिव उपाध्याय ने
पूरा किया।
आनन्द
भट्ट ने अपनी दीपिका
के अन्त में अपने
समय के सम्बन्ध में
एक श्लोक उद्धृत किया है- ‘वेदसप्तपिवेदान्त्ययुगाब्द
मधुपक्षती । विज्ञानकौमुदीमेतां भट्टानन्दो व्यवासयत्’
।। इसके अनुसार मैंने
संस्कृत के कई विद्वानों
से विचार-विमर्श किया, किन्तु उदयपुर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य
श्री बिहारीलाल दशोरा इसे अधिक स्पष्ट
कर पाये । उनके
अनुसार ४७७४ कलिंगणाब्द की
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को भनन्दने विज्ञान-कौमुदी नाम की टीका
समाप्त की कामीरदर्शन के
आचायों में कलिगणना देने
की परम्परा रही है। अतः
कलिगणना की विक्रम संवत्
के साथ तुलना करने
पर उक्त टीका का
समय वि० सं० १७२९
( १७७३ ई० ) निश्चित होता
है।
यदि
भट्ट आनन्द की यह तिथि
भी मान ली जाय
तो ये शिवोपाध्याय से
पूर्व के ठहरते हैं
। अतः यह प्रश्न
फिर भी बना रहता
है कि एक ही
ग्रन्थ पर टीका लिखने
वाले शिवोपाध्याय ने भट्ट आनन्द
का उल्लेख क्यों नहीं किया ?- इस
पर विस्तार से विचार करना
अध्ययन एवं समय सापेक्ष
है । पक्षति शब्द का अर्थ
है-पक्ष की मूल
तिथि प्रतिपदा । ३० अमरकोप,
काल, श्लोक १ माहेश्वरी टीका
। विषयः क्रमात् पञ्चदशाः स्मृताः ।
इह श्रीमान् चिभैरवः पूर्णाहंदिमशत्मपराक्तस्फुरत्ताभित्तावन्तः
कृता- नन्तावान्तरदिप चपूर्वपूर्वदशनिमेषणशीन्मिषदुत्तरोतरावस्थेच्छाज्ञान- परशक्तिपूर्तः ॥ ४ ॥ क्रियाशक्तिसारानाथितसदाशिवेश्वरपदावभासनस्वरूप
बीजागोप जगद व्यवस्वामिव निमिष
सर्यादिवचोन्मिपदी धरादिस्फुरणया अनुग्रहनिम ज्जितमितमातृतच्छक्युन्मज्जित
रुद्रयामलसमावेशमुन्मीलयति
– इत्यद्वयनयेषु पचहत्यकारितयते भगवतः तत्र पश्यन्यादिपदे दोतनादित्वा
संवि देवी प्रवृध्यमानतया प्रष्ट्री
स्वा परर्नरवाभिन्ना पराभूमि सदा स्वाभासा- मप्यन्तर्बाह्याक्षागोचरत्वात्
परोक्षामिव पश्यन्त्यादिकालापेक्षया तु भूतामिव, ततलेषज्ञतत्तत्प्राणांशांशिकापेक्ष्यकल्पावधिकदिनमासान्वयाभावाद्
अयत- नीमिव यावदामामृतात् ‘गुप्त इति मेव
विज्ञानभैरव: संविदेवी पश्वन्त्यादिपदे प्रभुत्रस्फुटस्फुरितपराभट्टारिक
चकाराद्रहस्य- मुवाचामम एवं प्रबुद्धा सती
नेराकाश्या ‘भिया सर्व वयति’
इति निरुक्तभैरवरूपा अहमेवोवाचेति- देव……’ इत्यादेः । भैरव उवाच- ‘साधु
साधु’ इत्यादिकमभ्यस्य ‘सर्वत्रिशक्तिभेदानां हृदयं ज्ञातमद्य च’ इत्यन्तस्य नास्त्रस्य
परसम्बन्धप्राणतव । तदित्वं परसम्बन्धसतत्त्वं
1 श्रीविज्ञानमेवाभिधानन्दिता
देवी कण्ठे लग्ना शिवस्य तु इत्यन्तेऽभिधास्यमानत्वात् विज्ञानभैरवावेसप्रयोजनत्वात्तदभिधानमेवेद
शास्त्रम् तस्त्रावतारकभूमिमानुवाना पराभट्टारिका उचितवचनरचना- क्रमेण वस्तुपूर्वकमुपक्षिपति ।
भगवान्
शिव ‘आग’ शास्त्रों में
प्रतिपादित कर्म, उपासना और ज्ञान भेद
से ‘यामवादि’ ग्रन्थों में प्रतिपादित रहस्य
को ज्ञान रूप में दर्शन
के अद्वय तत्त्व को प्रतिपादित करने
की इच्छा से शक्ति द्वारा
किये हुए प्रश्नों के
रूप में स्वयं (शिव)
आत्मतत्त्व के प्रतिपादनार्थ ग्रन्य
प्रारम्भ करते हैं-
अनुवाद- देवी बोली हे
देव! मैंने आपके ‘रुद्रयामल’ (शास्त्र) में प्रतिपादित सार
का भी सार, जो
बिक भेद है, उसको
विभागणः सम्पूर्ण सुना। पर हे परमेश्वर
! अब भी मेरा सन्देह
निवृत्त नहीं हुआ ।।
१ ।।
व्याख्या
हे देव! आप विश्व
को प्रकट कर उसमें क्रीडा
करते हुए अनादि सत्
तत्त्व स्वरूप हो, सम्पूर्ण रोगों
को द्रवित करने के कारण
रूद्र कहलाते हैं, और उस
स्व-शक्ति के सामरस्य से
‘पामल’ बन कर संसार
के सम्मुख जाते हैं, जैसा
कि शास्त्रों में कहा गया
है- अष्टविग्रहाच्छान्ताच्छिवात्परमकारणात्
। ध्वनि विनिष्कान्तं शास्त्रं परमदुर्लभम् ।।’ जिसका शरीर दृष्टिगोचर नहीं
है, ऐसे परमकारण शिव
से परमदुर्लभ ‘ध्वनि रूप’ शास्त्र उत्पन्न
हुआ है। अर्थात्- ‘श्यामलात्
सम्भवा यस्य तत् स्यामयम्
।
नवावान्तरन्थिमुपयति
किमिवान तत्त्वं स्यादित्याशयेन- कि वा नवात्मभेदेन
भैरवे भैरवाकृतौ । त्रिशिरोभेदभिन्नं वा कि
वा शक्तित्रयात्मकम् ॥ ३ ॥
नादबिन्दुमयं वापि किं चन्द्रार्धनिरोधिकाः
। चामन या कि
वा शक्तित्वरूपकम् ॥ ४ ॥ भैरवाकृतौ संसारघट्टनस्वरूपे भैरवभट्टारके, तत्त्वदृष्ट्या शब्दराशेरादि- तस्य वा कला
अनुत्तरानन्देच्छादिविमर्थशतयः
क्रोटीकृताशेषवाच्य वाचकमयजगत्स्फाराः ताः प्रकृतं रूपं
यस्य बोधभैरवस्य विमर्शशक्त्यात्मक- स्वात् तत् कि स्यात्
रूपम्?
कि वा प्रकृत्यादि- शिवान्तवाक्य
विमृष्टपडध्व-नवात्ममन्त्रराजस्वभावतया रूपं स्यात् ? कि
वा त्रिशिरोभेदे त्रिशिरस्तन्वे भिन्नं क्रोडीकृताखिलनरादितत्त्वत्रयामर्शि
निर्दिष्टविशिष्टमन्त्रा-
त्मकम् ? कि तदधिष्ठातृपरादिशक्तित्रयात्मकम् ? यदि वा सर्वमन्त्रचक्र-
सामान्यवीत्मविश्वाच्याविभागप्रकाशरूपविन्द्र
रोषवाचकाविभागपरामर्श- मयनादात्मकम् ? अर्थतद् विन्दुनादरूपचन्द्रनिरोधकास्तत्त्वतो
भैरवे रूपं स्यात् ।
तत्र
सर्ववायाभिप्रकाशात्मनो
विन्दोनदीभवतः किञ्चिद्वाच्यत्राधान्य- शान्तवर्धचन्द्ररूपता ततोऽपि वेदकौटिल्यविगमे स्पष्टरेलरमा निरोधका मितयोगिनां नानुप्रवेशस्य इतरेषां तु भेददशावेशस्य निरोधात्
तचाख्या बहुवचनमाद्यर्थं नादान्तशक्तिव्यापिनीगमनाच्या
नादाला लक्षयति तम नादस्यैव शब्दव्याप्तेः
शाम्यत्तायां सुसूक्ष्मध्वन्यात्मा नादान्तः प्रशान्तौ तु ह्लादात्मस्पर्शव्याप्त्युग्मेषरूपा शक्तिः, सैव देहानवच्छेदाद् व्योमव्याप्यत्यासादाद्
व्यापिनी, समस्तभावाभावात्मवेद्यप्रशान्ती
मननमात्रात्मककरणरूपबोधमात्रा-
देशे समता इत्येतदचन्द्रादिमत्कारहस्यम् एवं मातृकामन्वतीयंत मेयलेन
विमृश्य ध्येयमहामन्त्रमुखेनापि भगवद्रूपं विमृशति ‘चक्रेति’ जन्मादि- चक्रेण्वारूढं लिपिध्यानेनेव न्यस्तम्, अनकं ह-कलात्म
नादमयं कि रूपम् ? या
कौटिल्यमुस्पष्टशक्तिस्वरूपं
भैरवे कि रूपम् ? इति
।। २०४ ।।
अनुवाद
हे भगवन् ! यह वास्तविक स्वरूप
किस प्रकार का है यह
तत्त्व से समझाइए क्या
यह स्वरूप शब्द राशि कलात्मक
(शब्दब्रह्मात्मक )’ है ? अथवा ‘नवतत्त्वात्मक’
है? किंवा सच्चिदानन्दस्वरूप पूर्ण ब्रह्म-भाव भूत पंचकृत्य
स्वभावभूत चैतन्यतस्व में नर-दाक्ति’
और शिवात्मरूप से त्रिशिरोभेदभिन्न रूप
का है ? अथवा ‘मातृ’
‘मान’ और ‘मेय’ व्यापार
रूप जन्य ‘इच्छा’ ‘ज्ञान’ और ‘क्रिया’ शक्ति
स्वरूप है ? ।। २-३ ॥
अर्थात्
क्रम सृजन अवस्था में
स्वास्थ्यशक्ति क्रमसंसिसृक्षा और क्रमात्मकता- ये
व्यापक परमात्मा की त्रिमूर्तियां है
ये तीनों शक्तियों ही ‘त्रिदेवी’ है।
इसलिए आगे का स्वरूप
कृपा करके मुझे बताइए
क्योंकि इस प्रकार प्रतिपादन
किया हुआ ‘अपराशक्ति’ और
‘परापराशक्ति’ का स्वरूप समान
होने के कारण यदि
सदृश है, तो पर
इन दोनों से विरुद्ध है।
परापरा’ और अपरा भेद
की उपपत्ति के कारण पराशक्ति
में इन दोनों का
अभेद स्वभाव है।
इसीलिए
‘परा’ स्वरूप में परत्व विरुद्ध
हो जायेगा और परंपरा में
सफलरूप ही जानने योग्य
रहने के कारण समुदाय
के मध्य में गिर
जाने से परापरा में
कोई भेद नहीं रहेगा।
यहाँ ‘पर’ और परापरा
में अभेदता आ जाने के
कारण विरुद्ध दोष होगा।
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